किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला सरकारी नौकरी में नहीं बन सकता बाधा, हाईकोर्ट ने रद्द की सीआरपीएफ के आरक्षी की बर्खास्तगी
25 फीसदी बकाया वेतन देने का आदेश
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किशोरावस्था में दर्ज आपराधिक मामला वयस्क होने पर सरकारी नौकरी में बाधक नहीं बन सकता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने बर्खास्त सीआरपीएफ के आरक्षी को बड़ी राहत दी है।
न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने याची चंद्रेश्वर प्रसाद यादव की बर्खास्तगी समेत अपील और पुनरीक्षण के आदेशों को रद्द कर 25 फीसदी बकाया वेतन देने का आदेश दिया है। याची वर्ष 2003 में सीआरपीएफ में आरक्षी पद पर भर्ती हुआ था।
प्रशिक्षण के दौरान चरित्र प्रमाणपत्र सत्यापन में पता चला कि उसके खिलाफ आजमगढ़ में 2001 में गालीगलौज, मारपीट और धमकी देने के आरोप में मुकदमा दर्ज था। जानकारी छिपाने के आधार पर पांच अगस्त 2004 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि मुकदमा दर्ज होने के समय याची नाबालिग था। किशोर न्याय अधिनियम के तहत उस समय दर्ज मामले का वयस्क होने के बाद सरकारी सेवा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि याची को 28 फरवरी 2005 को मामले में बरी कर दिया गया था। इसके बाद भी पुनरीक्षण प्राधिकारी ने इस तथ्य पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने करीब 20 वर्ष तक सेवा से बाहर रहने के कारण याची को केवल 25 फीसदी बकाया वेतन देने का आदेश दिया।
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